धरमेंद्र: हिंदी सिनेमा का असली हीरो, दिलों का बादशाह
1935 में पंजाब के संगरूर ज़िले के एक छोटे से गांव में जन्मे धरम सिंह देओल, जिनका नाम आगे चलकर "धरमेंद्र" बना, कभी सोच भी नहीं सकते थे कि वह एक दिन बॉलीवुड के सबसे प्यारे और सम्मानित सितारों में गिने जाएंगे। संघर्ष के दिनों में वे रेलवे क्लर्क की नौकरी करते थे, लेकिन उनके सपनों की उड़ान आसमान छूना चाहती थी।
धरमेंद्र का फिल्मी सफर 1960 में “दिल भी तेरा हम भी तेरे” से शुरू हुआ। शुरुआत में लोगों ने उनके रूप को देखा, पर धीरे-धीरे उनके अभिनय की गहराई को महसूस किया। “फूल और पत्थर” से लेकर “शोले”, “चुपके चुपके”, “सत्यकाम”, “आया सावन झूम के” जैसी फिल्मों में उन्होंने जो दिल छू लेने वाला अभिनय किया, वो आज भी दर्शकों की आंखों को नम कर देता है।
धरमेंद्र सिर्फ “ही-मैन” नहीं थे, वे एक इमोशनल इंसान भी थे — जो अपनी आंखों से बोलते थे, अपने दर्द को मुस्कान में छिपाते थे। “सत्यकाम” का ईमानदार इंजीनियर, “अनुपमा” का संवेदनशील प्रेमी या “शोले” का वीरू — हर किरदार में एक सच्चा इंसान झलकता है।
धरमेंद्र का असली आकर्षण उनके दिल से जुड़े होने में था। वे स्टार होकर भी कभी जमीन से अलग नहीं हुए। उनकी मुस्कान में अपनापन था, उनकी आंखों में अपने गांव की मिट्टी की सादगी। यही वजह है कि आज भी जब उनका नाम लिया जाता है तो चेहरे पर एक मुस्कुराहट और दिल में एक गर्माहट महसूस होती है।
आज वे उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ ज्यादातर लोग आराम करते हैं, पर धरम पाजी अभी भी सिनेमा से जुड़े हैं, अपने बच्चों और पोतों की फिल्मों पर गर्व करते हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया कि सच्चा हीरो वही है जो पर्दे पर नहीं, दिलों में बसता है।
धरमेंद्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं — वो एक एहसास हैं, एक दौर हैं, एक ऐसी याद हैं जो कभी पुरानी नहीं होगी।
धरम पाजी अमर हैं, क्योंकि उन्होंने अभिनय नहीं, इंसानियत जी है। ❤️


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👌🌹👌
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