🔷ईमान🔷
ईमान का बढ़ना–घटाना और अल्लाह की राह में मोहब्बत व दुश्मनी का असली मतलब
इस्लाम में ईमान (Faith) केवल एक बार दिल में आने वाली चीज़ नहीं, बल्कि यह बढ़ता–घटता रहता है। कुरआन और हदीस दोनों में इसके कई स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। जब इंसान अल्लाह पर भरोसा करता है, नेक अमल करता है और अल्लाह के हुक्मों पर चलता है, तो उसका ईमान बढ़ता है। और जब इंसान ग़फ़लत में पड़ जाए या अल्लाह के आदेशों से दूर हो जाए, तो ईमान में कमी आने लगती है।
ईमान बढ़ने का कुरआनी सबूत
पहली तस्वीर में जो आयतें दी गई हैं, उन में यह बताया गया है कि जब ईमान वालों ने अल्लाह की बात सुनी तो:
⚡"उनका ईमान और बढ़ गया"
(सूरह आले इमरान: 173)
यह इस बात का साफ़ प्रमाण है कि ईमान स्थिर नहीं रहता बल्कि इंसान के अमल, उसके रवैये और अल्लाह पर भरोसे के मुताबिक बढ़ता भी है और कम भी हो सकता है।
अल्लाह पर भरोसा—ईमान की सबसे बड़ी निशानी
जब मुसलमानों को किसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, तो उनके दिल से यही आवाज़ निकलती है:
"हस्बुनल्लाहु व निअमल वकील"
(अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह सबसे अच्छा काम बनाने वाला है)
यह जुमला सिर्फ ज़बानी नहीं, बल्कि एक सच्चे मोमिन की सबसे बड़ी पहचान है। जिसने अल्लाह पर पूरा भरोसा कर लिया, उसके ईमान की ताक़त बढ़ जाती है।
ईमान सिर्फ यकीन नहीं, इत्तेआत भी जरूरी
🔷दूसरी तस्वीर में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि:
⚡ईमान सिर्फ दिल का यकीन नहीं
⚡बल्कि इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है
⚡ईमान का तल्लुक़ क़ोल (ज़बान), अक़ीदा (यकीन) और फ़ेअल (अमल) — तीनों से है
👉इंसान के अमल जितने अच्छे होंगे, ईमान उतना मज़बूत होगा। यही वजह है कि कुरआन में बार-बार कहा गया:
👉"अल्लाह ने उनके ईमान में और ईज़ाफ़ा कर दिया"
(सूरह क़हफ़: 13)
💡अल्लाह की राह में मोहब्बत रखना—ईमान का हिस्सा
⚡हदीस में आया है कि:
👉अल्लाह की राह में मोहब्बत रखना
👉और अल्लाह ही के लिए किसी से दुश्मनी रखना
यह भी ईमान का हिस्सा है।
(अबू दाऊद, अन अबी उमामा)
👌मतलब, एक मोमिन की मोहब्बत या नफरत नफ़्स की, जाति की या फायदे की वजह से नहीं होती, बल्कि वह अल्लाह की खुशी के लिए होती है।
👉सच्चे ईमान की पहचान
1. अल्लाह पर भरोसा करना
2. नेकी की राह पर बढ़ना
3. गुनाह से बचना
4. अल्लाह के हुक्मों की पूरी इत्तेआत करना
5. अल्लाह के लिए मोहब्बत और अल्लाह के लिए दुश्मनी रखना
📚कुरआन कहता है:
👉"जो लोग ईमान लाए, अल्लाह ने उनके ईमान को और बढ़ा दिया।"
(सूरह तौबा: 124)
👉ईमान का बढ़ना–घटना क्यों जरूरी है?
👉क्योंकि इंसान की हालत हमेशा बदलती रहती है—
⚡कभी दिल नरम हो जाता है
⚡कभी ग़फ़लत आ जाती है
⚡कभी ईमान की रोशनी बढ़ जाती है
⚡कभी कमजोरी महसूस होती है
👉यह सब इंसानी फितरत का हिस्सा है। लेकिन मोमिन की पहचान यह है कि वह हमेशा अपने ईमान की हिफाज़त करता है।
💡खुलासा :-
👉 तफसीर यह बताती है कि:ईमान एक जिंदा चीज़ है
👉यह बढ़ता भी है, घटता भी है
👉अल्लाह की राह में मोहब्बत रखना, अल्लाह पर भरोसा करना, और नेक अमल—ईमान को मज़बूत करते हैं
👉गुनाह, ग़फ़लत और अल्लाह से दूर रहना—ईमान को कमजोर कर देते हैं
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह हमेशा अपने ईमान को बढ़ाने की कोशिश करता रहे—कुरआन पढ़कर, अल्लाह की याद में, नमाज़, रोज़ा, सदक़ा और नेक अमल के ज़रिए।
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