Hadis : Sahih Bukhri (1)

 हदीस

सह़ीह़ बुख़ारी की हदीसों में वर्णित है

🕌 वही (ईश्वरीय रहस्योद्घाटन) का आरंभ: नबुव्वत (पैगम्बरी) का सवेरा

हर महान यात्रा का एक आरंभ बिंदु होता है। इस्लाम के इतिहास में, सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वह क्षण था जब अल्लाह के अंतिम पैगम्बर, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईश्वरीय रहस्योद्घाटन यानी 'वही' का अवतरण शुरू हुआ। यह घटना न केवल आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवन को, बल्कि पूरी मानवता के इतिहास को हमेशा के लिए बदल देने वाली थी।

सह़ीह़ बुख़ारी की आरंभिक हदीसें इस महान क्षण का विशद वर्णन करती हैं।

🌄 ख़लवतनशीनी (एकांतवास) और पहला वही

वही का आरंभ, जैसा कि उम्मुल मो'मिनीन हज़रत आइशा (रज़ि.) से रिवायत है, सच्चे और अच्छे ख्वाबों (सपनों) से हुआ। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ख्वाब में जो कुछ देखते, वह सुबह की रौशनी की तरह सच और स्पष्ट होता।

इसके बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तन्हाईपसंद (एकांतप्रिय) हो गए और मक्का से दूर गारे हिरा में जाकर कई-कई दिन और रात अल्लाह की इबादत और ज़िक्र-ओ-फ़िक्र में मश्गूल (लीन) रहने लगे। जब तोशा (खाना-पानी) खत्म हो जाता, तो आप हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) के पास आते, और वह और तोशा साथ लेकर फिर वापस गारे हिरा चले जाते।

एक रात जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) गारे हिरा में थे, तो अचानक हज़रत जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) फ़रिश्ता आपके पास आया और कहा: "पढ़ो!"

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जवाब दिया: "मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ।"

फ़रिश्ते ने आपको पकड़कर ज़ोर से भींचा (दबाया) कि आपकी ताक़त जवाब दे गई। फिर छोड़ा और दोबारा कहा: "पढ़ो!" आपने फिर वही जवाब दिया। फ़रिश्ते ने आपको तीसरी बार पकड़ा और भींचा, और फिर कहा:

> "पढ़ो! अपने रब के नाम की मदद से जिसने पैदा किया, जिसने इंसान को ख़ून की फुटकन से बनाया, पढ़ो! और आपका रब बहुत ही मेहरबानियाँ करने वाला है।" (सूरतुल-अलक़, 96:1-3)

ये क़ुरआन की पहली आयतें थीं जो नाज़िल हुईं। हज़रत जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) का आना और ये आयतें पढ़कर वापस चले जाना, ये सब कुछ देखकर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का दिल भय और आश्चर्य से भर गया।

🤝 तसल्ली और वरक़ा बिन नौफ़ल की गवाही

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फौरन घर वापस आए, थरथराते हुए अपनी अहलिया हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) से कहा: "मुझे कंबल ओढ़ा दो, मुझे कंबल ओढ़ा दो।"

जब आप कुछ शांत हुए, तो आपने उन्हें सारा वाक़्या (घटना) तफ़सील से सुनाया और फ़रमाया: "मुझको अपनी जान का ख़ौफ़ हो गया।"

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) ने जिस हिम्मत और यक़ीन के साथ जवाब दिया, वह इतिहास में अमर है। उन्होंने कहा: "हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी रुस्वा नहीं करेगा। आप तो अख़्लाक़े-फ़ाज़िला (श्रेष्ठ चरित्र) के मालिक हैं, आप तो कु़रबा परवर हैं, बेकसों का बोझ अपने सर पर उठा लेते हैं, मुफ़लिसों के लिए कमाते हैं, मेहमान नवाज़ी में बेमिसाल हैं और मुश्किल वक़्त में हक़ बात का साथ देते हैं..."

फिर हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) आपको अपने चचाज़ाद भाई वरक़ा बिन नौफ़ल के पास ले गईं। वरक़ा ईसाइयत के जानकार थे और इब्रानी ज़बान में इंजील लिखते थे।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने वरक़ा को पूरा वाक़्या सुनाया। यह सुनकर वरक़ा बेख़्तियार बोल उठे:

> "यह तो वही 'नामूस' (वह मुअज़्ज़ज़ फरिश्ता) है जिसे अल्लाह ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) पर वह़ी देकर भेजा था! काश! मैं आपके उस ओहदे-ए-नबुव्वत के शुरू होने पर जवान होता। काश! मैं उस वक़्त तक ज़िन्दा रहता जबकि आपकी क़ौम आपको इस शहर से निकाल देगी।"

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ताज्जुब से पूछा: "क्या वो लोग मुझको निकाल देंगे?"

वरक़ा ने जवाब दिया: "हाँ! मगर जो शख़्स भी आपके तरीक़े पर अम्न (आदेश) लेकर आया, लोग उसके दुश्मन ही हो गए हैं।"

वरक़ा बिन नौफ़ल ने भविष्यवाणी की पुष्टि की कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पैगम्बर हैं। हालाँकि, कुछ ही दिनों बाद वरक़ा का इंतिक़ाल (देहांत) हो गया और कुछ वक़्त के लिए वही का अवतरण मौकूफ़ (स्थगित) रहा, जो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए एक इम्तेहान था।

📜 वही अवतरण की क़ैफियत (प्रकृति)

हज़रत आइशा (रज़ि.) से एक और रिवायत में वही के अवतरण की प्रकृति का वर्णन किया गया है। हारिस बिन हिशाम (रज़ि.) ने एक बार आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा था कि आप पर वही कैसे नाज़िल होती है?

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया:

> "वही नाज़िल होते वक़्त कभी-कभी मुझे घंटी की-सी आवाज़ महसूस होती है और वही की यह क़ैफियत मुझ पर बहुत शाक़ (नाक़ाबिले बर्दाश्त/असहनिय) गुज़रती है। जब ये क़ैफियत ख़त्म होती है तो मेरे दिलो-दिमाग़ पर (उस फ़रिश्ते के ज़रिए) नाज़िलशुदा वही महफ़ूज़ हो जाती है।"

> "और किसी वक़्त ऐसा होता है कि फ़रिश्ता ब-शक्ल-ए-इंसान मेरे पास आता है और मुझसे कलाम करता है। बस मैं उसका कहा हुआ याद रख लेता हूँ।"

हज़रत आइशा (रज़ि.) बयान करती हैं कि उन्होंने सख़्त कड़ाके की सर्दी में भी आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा है कि जब आप पर वही नाज़िल होती थी और जब उसका सिलसिला मौकूफ़ (ख़त्म/स्थगित) होता था, तो आपकी पेशानी पसीने से तर-ब-तर (पसीने से लथपथ) होती थी। यह वही की क़ैफियत की असीम शिद्दत को दर्शाता है।

✨ रमज़ान और इबादत

इब्ने अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सब लोगों से ज़्यादा जव्वाद (सख़ी/दानशील) थे, और रमज़ान के महीने में जब हज़रत जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) आपसे मुलाक़ात करते तो आप बहुत ही ज़्यादा जूदो-करम (दानशीलता) फ़रमाते।

जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) रमज़ान की हर रात आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से मुलाक़ात करते और आपके साथ क़ुरआन का दौर (दुहराव) करते थे। इस वजह से आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) लोगों को भलाई पहुँचाने में बारिश लाने वाली हवा से भी ज़्यादा जूद-ओ-करम फ़रमाया करते थे। यह वही के अवतरण और अभ्यास का आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मुबारक़ मिज़ाज और सख़ावत पर गहरा असर दिखाता है।

💡 नतीजा

वही का आरंभ, एक एकांतवास में, एक ज़बरदस्त रूहानी (आध्यात्मिक) अनुभव के साथ हुआ। यह घटना प्रमाणित करती है कि पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अल्लाह की ओर से चुना गया था, और यह क़ुरआन, जो आप पर नाज़िल हुआ, ईश्वरीय कलाम (वाणी) है। वही का यह आरंभ इस्लाम की पूरी बुनियाद है।

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